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द्रोण पर्व
अध्याय १६३
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सञ्जय़ उवाच
तत्र स्मान्तर्हिता वाचो व्यचरन्त पुनः पुनः |  ३६   क
द्रोणस्य स्तवसंय़ुक्ताः पार्थस्य च महात्मनः |  ३६   ख
विसृज्यमानेष्वस्त्रेषु ज्वालय़त्सु दिशो दश ||  ३६   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति