आदि पर्व  अध्याय ५७

वैशम्पाय़न उवाच

स पितृणां निय़ोगं तमव्यतिक्रम्य पार्थिवः |  ३८   क
चचार मृगय़ां कामी गिरिकामेव संस्मरन् |  ३८   ख
अतीव रूपसम्पन्नां साक्षाच्छ्रिय़मिवापराम् ||  ३८   ग
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति