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आदि पर्व
अध्याय ५७
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वैशम्पाय़न उवाच
इन्द्रत्वमर्हो राजाय़ं तपसेत्यनुचिन्त्य वै |  ४   क
तं सान्त्वेन नृपं साक्षात्तपसः संन्यवर्तय़त् ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति