आदि पर्व  अध्याय ५७

वैशम्पाय़न उवाच

श्येनपादपरिभ्रष्टं तद्वीर्यमथ वासवम् |  ४८   क
जग्राह तरसोपेत्य साद्रिका मत्स्यरूपिणी ||  ४८   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति