आदि पर्व  अध्याय ५७

वैशम्पाय़न उवाच

शुश्रूषार्थं पितुर्नावं तां तु वाहय़तीं जले |  ५६   क
तीर्थय़ात्रां परिक्रामन्नपश्यद्वै पराशरः ||  ५६   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति