आदि पर्व  अध्याय ५७

वैशम्पाय़न उवाच

अतीव रूपसम्पन्नां सिद्धानामपि काङ्क्षिताम् |  ५७   क
दृष्ट्वैव च स तां धीमांश्चकमे चारुदर्शनाम् |  ५७   ख
विद्वांस्तां वासवीं कन्यां कार्यवान्मुनिपुङ्गवः ||  ५७   ग
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति