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आदि पर्व
अध्याय ५७
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इन्द्र उवाच
लोक्यं धर्मं पालय़ त्वं नित्ययुक्तः समाहितः |  ६   क
धर्मय़ुक्तस्ततो लोकान्पुण्यानाप्स्यसि शाश्वतान् ||  ६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति