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आदि पर्व
अध्याय ५७
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वैशम्पाय़न उवाच
कन्यात्वे दूषिते चापि कथं शक्ष्ये द्विजोत्तम |  ६२   क
गन्तुं गृहं गृहे चाहं धीमन्न स्थातुमुत्सहे |  ६२   ख
एतत्सञ्चिन्त्य भगवन्विधत्स्व यदनन्तरम् ||  ६२   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति