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आदि पर्व
अध्याय ५७
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वैशम्पाय़न उवाच
सञ्जय़ो मुनिकल्पस्तु जज्ञे सूतो गवल्गणात् |  ८२   क
सूर्याच्च कुन्तिकन्याय़ां जज्ञे कर्णो महारथः |  ८२   ख
सहजं कवचं विभ्रत्कुण्डलोद्द्योतिताननः ||  ८२   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति