उद्योग पर्व  अध्याय ५८

वासुदेव उवाच

ऋणमेतत्प्रवृद्धं मे हृदय़ान्नापसर्पति |  २१   क
यद्गोविन्देति चुक्रोश कृष्णा मां दूरवासिनम् ||  २१   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति