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आदि पर्व
अध्याय ५७
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वैशम्पाय़न उवाच
गौतमान्मिथुनं जज्ञे शरस्तम्वाच्छरद्वतः |  ९०   क
अश्वत्थाम्नश्च जननी कृपश्चैव महावलः |  ९०   ख
अश्वत्थामा ततो जज्ञे द्रोणादस्त्रभृतां वरः ||  ९०   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति