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आदि पर्व
अध्याय ५७
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वैशम्पाय़न उवाच
तथैव वेद्यां कृष्णापि जज्ञे तेजस्विनी शुभा |  ९२   क
विभ्राजमाना वपुषा विभ्रती रूपमुत्तमम् ||  ९२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति