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आदि पर्व
अध्याय ५७
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वैशम्पाय़न उवाच
प्रह्रादशिष्यो नग्नजित्सुवलश्चाभवत्ततः |  ९३   क
तस्य प्रजा धर्महन्त्री जज्ञे देवप्रकोपनात् ||  ९३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति