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आदि पर्व
अध्याय ५७
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वैशम्पाय़न उवाच
कृष्णद्वैपाय़नाज्जज्ञे धृतराष्ट्रो जनेश्वरः |  ९५   क
क्षेत्रे विचित्रवीर्यस्य पाण्डुश्चैव महावलः ||  ९५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति