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द्रोण पर्व
अध्याय १२३
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सञ्जय़ उवाच
महाप्रभावा वहवस्त्वय़ा तुल्याधिकापि वा |  २४   क
समेताः पृथिवीपाला धार्तराष्ट्रस्य कारणात् |  २४   ख
ते त्वां प्राप्य रणे क्रुद्धं नाभ्यवर्तन्त दंशिताः ||  २४   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति