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द्रोण पर्व
अध्याय १०६
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सञ्जय़ उवाच
कर्णस्तु रथिनां श्रेष्ठश्छाद्यमानः समन्ततः |  ४२   क
राजन्व्यसृजदुग्राणि शरवर्षाणि संय़ुगे ||  ४२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति