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शान्ति पर्व
अध्याय ५७
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भीष्म उवाच
सप्ताङ्गे यश्च ते राज्ये वैपरीत्यं समाचरेत् |  ५   क
गुरुर्वा यदि वा मित्रं प्रतिहन्तव्य एव सः ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति