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अनुशासन पर्व
अध्याय ५७
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वैशम्पाय़न उवाच
पय़ोभक्षो दिवं याति स्नानेन द्रविणाधिकः |  १२   क
गुरुशुश्रूषय़ा विद्या नित्यश्राद्धेन सन्ततिः ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति