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वन पर्व
अध्याय ८१
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पुलस्त्य उवाच
विश्वामित्रस्य तत्रैव तीर्थं भरतसत्तम |  १२०   क
तत्र स्नात्वा महाराज व्राह्मण्यमभिजाय़ते ||  १२०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति