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अनुशासन पर्व
अध्याय ५७
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युधिष्ठिर उवाच
प्राप्य राज्यानि शतशो महीं जित्वापि भारत |  २   क
कोटिशः पुरुषान्हत्वा परितप्ये पितामह ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति