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अनुशासन पर्व
अध्याय ५७
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वैशम्पाय़न उवाच
सान्त्वदः सर्वभूतानां सर्वशोकैर्विमुच्यते |  २१   क
देवशुश्रूषय़ा राज्यं दिव्यं रूपं निय़च्छति ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति