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अनुशासन पर्व
अध्याय ५७
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वैशम्पाय़न उवाच
सदक्षिणां काञ्चनचारुशृङ्गीं; कांस्योपदोहां द्रविणोत्तरीय़ाम् |  ३०   क
धेनुं तिलानां ददतो द्विजाय़; लोका वसूनां सुलभा भवन्ति ||  ३०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति