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अनुशासन पर्व
अध्याय ५७
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वैशम्पाय़न उवाच
स्वकर्मभिर्मानवं संनिवद्धं; तीव्रान्धकारे नरके पतन्तम् |  ३१   क
महार्णवे नौरिव वाय़ुय़ुक्ता; दानं गवां तारय़ते परत्र ||  ३१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति