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अनुशासन पर्व
अध्याय ५७
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वैशम्पाय़न उवाच
धुर्यप्रदानेन गवां तथाश्वै; र्लोकानवाप्नोति नरो वसूनाम् |  ३४   क
स्वर्गाय़ चाहुर्हि हिरण्यदानं; ततो विशिष्टं कनकप्रदानम् ||  ३४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति