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अनुशासन पर्व
अध्याय ११२
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वृहस्पतिरु उवाच
धर्मश्चार्थश्च कामश्च त्रितय़ं जीविते फलम् |  १७   क
एतत्त्रय़मवाप्तव्यमधर्मपरिवर्जितम् ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति