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अनुशासन पर्व
अध्याय ५७
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वैशम्पाय़न उवाच
वीजैरशून्यं शय़नैरुपेतं; दद्याद्गृहं यः पुरुषो द्विजाय़ |  ३९   क
पुण्याभिरामं वहुरत्नपूर्णं; लभत्यधिष्ठानवरं स राजन् ||  ३९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति