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अनुशासन पर्व
अध्याय ५७
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युधिष्ठिर उवाच
वय़ं हि तान्गुरून्हत्वा ज्ञातींश्च सुहृदोऽपि च |  ४   क
अवाक्षीर्षाः पतिष्यामो नरके नात्र संशय़ः ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति