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अनुशासन पर्व
अध्याय ५७
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वैशम्पाय़न उवाच
सुगन्धचित्रास्तरणोपपन्नं; दद्यान्नरो यः शय़नं द्विजाय़ |  ४०   क
रूपान्वितां पक्षवतीं मनोज्ञां; भार्यामय़त्नोपगतां लभेत्सः ||  ४०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति