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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५७
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वैशम्पाय़न उवाच
गृहीत्वा कुण्डले दिव्ये गुरुपत्न्याः प्रिय़ङ्करः |  १७   क
जवेन महता प्राय़ाद्गौतमस्याश्रमं प्रति ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति