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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५७
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वैशम्पाय़न उवाच
विशीर्णवन्धने तस्मिन्गते कृष्णाजिने महीम् |  २१   क
अपश्यद्भुजगः कश्चित्ते तत्र मणिकुण्डले ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति