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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५७
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वैशम्पाय़न उवाच
ह्रिय़माणे तु दृष्ट्वा स कुण्डले भुजगेन ह |  २३   क
पपात वृक्षात्सोद्वेगो दुःखात्परमकोपनः ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति