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द्रोण पर्व
अध्याय ६१
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धृतराष्ट्र उवाच
वृकोदरार्जुनौ यत्र वृष्णिवीरश्च सात्यकिः |  ३८   क
उत्तमौजाश्च पाञ्चाल्यो युधामन्युश्च दुर्जय़ः ||  ३८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति