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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५७
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सौदास उवाच
प्रजा निसर्गाद्विप्रान्वै क्षत्रिय़ाः पूजय़न्ति ह |  ५   क
विप्रेभ्यश्चापि वहवो दोषाः प्रादुर्भवन्ति नः ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति