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सभा पर्व
अध्याय ५७
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दुर्योधन उवाच
न वासय़ेत्पारवर्ग्यं द्विषन्तं; विशेषतः क्षत्तरहितं मनुष्यम् |  १२   क
स यत्रेच्छसि विदुर तत्र गच्छ; सुसान्त्वितापि ह्यसती स्त्री जहाति ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति