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सभा पर्व
अध्याय ५७
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विदुर उवाच
लभ्यः खलु प्रातिपीय़ नरोऽनुप्रिय़वागिह |  १७   क
अप्रिय़स्य तु पथ्यस्य वक्ता श्रोता च दुर्लभः ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति