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सभा पर्व
अध्याय ५७
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विदुर उवाच
अव्याधिजं कटुकं तीक्ष्णमुष्णं; यशोमुषं परुषं पूतिगन्धि |  १९   क
सतां पेय़ं यन्न पिवन्त्यसन्तो; मन्युं महाराज पिव प्रशाम्य ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति