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सभा पर्व
अध्याय ५७
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विदुर उवाच
वैचित्रवीर्यस्य यशो धनं च; वाञ्छाम्यहं सहपुत्रस्य शश्वत् |  २०   क
यथा तथा वोऽस्तु नमश्च वोऽस्तु; ममापि च स्वस्ति दिशन्तु विप्राः ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति