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सभा पर्व
अध्याय ५७
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दुर्योधन उवाच
उत्सङ्गेन व्याल इवाहृतोऽसि; मार्जारवत्पोषकं चोपहंसि |  ३   क
भर्तृघ्नत्वान्न हि पापीय़ आहु; स्तस्मात्क्षत्तः किं न विभेषि पापात् ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति