वन पर्व  अध्याय ५७

वृहदश्व उवाच

दमय़न्ती ततो दृष्ट्वा पुण्यश्लोकं नराधिपम् |  १   क
उन्मत्तवदनुन्मत्ता देवने गतचेतसम् ||  १   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति