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वन पर्व
अध्याय ५७
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वृहदश्व उवाच
वार्ष्णेय़ं तु ततो भैमी सान्त्वय़ञ्श्लक्ष्णय़ा गिरा |  ११   क
उवाच देशकालज्ञा प्राप्तकालमनिन्दिता ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति