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वन पर्व
अध्याय ५७
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वृहदश्व उवाच
यथा यथा हि नृपतिः पुष्करेणेह जीय़ते |  १३   क
तथा तथास्य द्यूते वै रागो भूय़ोऽभिवर्धते ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति