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वन पर्व
अध्याय ५७
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वृहदश्व उवाच
यथा च पुष्करस्याक्षा वर्तन्ते वशवर्तिनः |  १४   क
तथा विपर्ययश्चापि नलस्याक्षेषु दृश्यते ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति