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वन पर्व
अध्याय ५७
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वृहदश्व उवाच
सुहृत्स्वजनवाक्यानि यथावन्न शृणोति च |  १५   क
नूनं मन्ये न शेषोऽस्ति नैषधस्य महात्मनः ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति