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वन पर्व
अध्याय ५७
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वृहदश्व उवाच
यत्र मे वचनं राजा नाभिनन्दति मोहितः |  १६   क
शरणं त्वां प्रपन्नास्मि सारथे कुरु मद्वचः |  १६   ख
न हि मे शुध्यते भावः कदाचिद्विनशेदिति ||  १६   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति