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वन पर्व
अध्याय ५७
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वृहदश्व उवाच
तैः समेत्य विनिश्चित्य सोऽनुज्ञातो महीपते |  २०   क
यय़ौ मिथुनमारोप्य विदर्भांस्तेन वाहिना ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति