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वन पर्व
अध्याय ५७
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वृहदश्व उवाच
निशम्य सततं चाक्षान्पुण्यश्लोकपराङ्मुखान् |  ८   क
नलं च हृतसर्वस्वं धात्रीं पुनरुवाच ह ||  ८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति