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विराट पर्व
अध्याय ५७
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वैशम्पाय़न उवाच
आददानस्य हि शरान्सन्धाय़ च विमुञ्चतः |  १९   क
विकर्षतश्च गाण्डीवं न किञ्चिद्दृश्यतेऽन्तरम् ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति