विराट पर्व  अध्याय ५७

वैशम्पाय़न उवाच

स साय़कमय़ैर्जालैः सर्वतस्तान्महारथान् |  २   क
प्राच्छादय़दमेय़ात्मा नीहार इव पर्वतान् ||  २   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति