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विराट पर्व
अध्याय ५७
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वैशम्पाय़न उवाच
नराश्वकाय़ान्निर्भिद्य लोहानि कवचानि च |  ४   क
पार्थस्य शरजालानि विनिष्पेतुः सहस्रशः ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति