विराट पर्व  अध्याय ५७

वैशम्पाय़न उवाच

रथोपस्थाभिपतितैरास्तृता मानवैर्मही |  ९   क
प्रनृत्यदिव सङ्ग्रामे चापहस्तो धनञ्जय़ः ||  ९   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति